| | Ich kost’ Likör, der nie gebraut
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| 1 | | Ich kost’ Likör, der nie gebraut, |
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aus perlengroßem Krug, |
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nicht jedes Fass mit Wein vom Rhein |
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solch einen Trank je trug. |
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Betrunken von der Luft bin ich, |
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bade im Morgentau, |
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taumle endlose Sommer lang |
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durch Schenken ganz aus Blau. |
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Und wirft der Wirt die trunk’ne Bien’ |
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aus seinem „Fingerhut“, |
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und Falter meiden weitren Trunk, |
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ist mir nach mehr zumut! |
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Bis Seraph schwenkt den weißen Hut, |
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und zu den Fenstern rennt |
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die heil’ge Schar, mich „dicht“ zu sehn |
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gegen die Sonn’ gelehnt. |
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© Bertram Kottmann, |
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Aus dem Amerikanischen: |
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I taste a liquor never brewed, |
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From tankards scooped in pearl; |
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Not all the vats upon the Rhine |
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Yield such an alcohol! |
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Inebriate of air am I, |
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And debauchee of dew, |
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Reeling, through endless summer days, |
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From inns of molten blue. |
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When landlords turn the drunken bee |
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Out of the foxglove's door, |
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When butterflies renounce their drams, |
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I shall but drink the more! |
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Till seraphs swing their snowy hats, |
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And saints to windows run, |
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To see the little tippler |
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Leaning against the sun! |
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| | | Emily Elizabeth Dickinson, 1862 |
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| | | Die Deutsche Gedichtbibliothek |
| | | https://gedichte.xbib.de/ |
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