| | Spann meinen Lebenswagen an
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| 1 | | Spann meinen Lebenswagen an, |
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ich steh bereit, mein Gott! |
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Ein Blick noch auf die Pferde - |
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schleunig! Das genügt! |
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Setz auf die sichre Seite mich, |
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auf dass ich niemals fall’; |
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denn unsre Fahrt geht zum Gericht, |
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zuweilen geht’s bergab. |
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Was gehen mich die Brücken an, |
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das Meer, was sorgt es mich; |
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in ewges Rennen eingespannt |
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durch eigne Wahl und dich. |
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Lebwohl, all dem, was ich gewohnt, |
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lebwohl, Welt alter Zeit; |
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küsst mir die Hügel einmal noch; |
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zu gehn bin ich bereit! |
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© Bertram Kottmann, |
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aus dem Amerikanischen: |
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Tie the strings to my life, my Lord, |
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Then I am ready to go! |
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Just a look at the horses - |
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Rapid! That will do! |
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Put me in on the firmest side, |
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So I shall never fall; |
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For we must ride to the Judgment, |
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And it 's partly down hill. |
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But never I mind the bridges, |
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And never I mind the sea; |
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Held fast in everlasting race |
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By my own choice and thee. |
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| | | Emily Elizabeth Dickinson, 1862 |
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| | | Die Deutsche Gedichtbibliothek |
| | | https://gedichte.xbib.de/ |
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