| | Schneien
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| 1 | | Aus Sieben, bleigrau, stäubt’s, |
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bepudert Wald und Hain, |
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und Wolle, alabasterweiß, |
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deckt falt’ge Straßen ein. |
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Es glättet das Gesicht |
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von Berg und Niederung - |
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ein ebenmäß’ges Weiß von Ost |
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bis Osten wiederum. |
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Es hüllt das Gatter ein, |
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Riegel um Riegel, hoch, |
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bis es versunken scheint. |
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Wirft sein kristallen Tuch |
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auf Stapel, Stumpf und Stamm - |
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wo Sommer nahm Logis: |
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auf Furchen, wo die Frucht einst stand, |
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vergessen, doch für sie. |
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Mit Rüschen ziert’s den Pfahl |
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als wär’s der Kön’gin Bein - |
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beschwichtigt dann den Flockenspuk |
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und dementiert das Schnei’n. |
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© Bertram Kottmann |
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Aus dem Amerikanischen: |
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It sifts from leaden sieves, |
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It powders all the wood, |
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It fills with alabaster wool |
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The wrinkles of the road. |
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It makes an even face |
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Of mountain and of plain, - |
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Unbroken forehead from the east |
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Unto the east again. |
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It reaches to the fence, |
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It wraps it, rail by rail, |
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Till it is lost in fleeces; |
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It flings a crystal veil |
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On stump and stack and stem, - |
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The summer's empty room, |
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Acres of seams where harvests were, |
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Recordless, but for them. |
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It ruffles wrists of posts, |
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As ankles of a queen, - |
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Then stills its artisans like ghosts, |
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Denying they have been. |
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| | | Emily Elizabeth Dickinson, 1862 |
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| | | Die Deutsche Gedichtbibliothek |
| | | https://gedichte.xbib.de/ |
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